मनुष्य जाती का नागजातिसे रिश्ता
अपत्य प्राप्ती हेतु (संतती के लिए) शाप का संकेत करनेवाले सपने
पिशाच्चो के तकलिफ से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य जाती का नागजातिसे रिश्ता

भगवान श्रीकृष्ण ने भगवत गीता में स्पष्ट रुपसे कहा की हर एक उसके हलके - निचे अभिलाषा के अनुसार जन्म मिलता है । निच अभिलाषा का रुपांतर मन के अति दोषो में होता है । मिसाल के तोरपरवासना की अभिलाषा और अगर वासना पुर्ति न हो या किस कारण उसमें रुकावट या मुशकिल पैदा हो तो उसका क्रोध में रूपातंरण । क्रोध आदमी के विचार शक्ती को नष्ट करता है । अति वासना के लोभसे आदमी जब अपनी इन्सानियत खो बैठता है तो उसका जन्म सर्प योनी में होता है । इसका मतलब यह है की मृत्यु के पश्चात ऐसे व्यक्ती के आत्मा का पुर्नजन्म सर्प जाती में होता है । सर्प जाती का और मनुष्य का संबंध प्राचीन कालसे है ।

महाभारत में यह संबंध अधिक स्पष्ट है । ब्रम्हाने सात ऋषियो का निर्माण किया था । उनमेसे एक कश्यप मुनि मारिच के पुत्र थे । इनकी दो भार्या थी , एक का नाम कद्रु था और दुसरी का विनिता । कद्रु की संतती साप के रुपमें थी और विनिता के शिशु गरूड रुपसे इस तरह साप एवं मनुष्य के संबंध देखे जाते है ।

सत्ताईस नक्षत्रो में रोहिणी और मृगशीर्ष के वंश भी सर्प जाती के माने जाते है । इसलिए मनुष्य प्राणी एवं सर्प जाती के संबंध एक जैसे लगते है । योगशास्त्र के अनुसार शरीर एवं दिल कुंडलिनी के शक्ती के जागृती से मोहित होता है । कुंडलिनी भी मनुष्य के शरीर मे स्थित है । मान्यवर संत ज्ञानेश्वर जी ने कुंडलिनीकी संकल्पना बडी सुंदरतासे ज्ञानेश्वरी में विशद की है । कुंडलिनी यह एक सर्पकार नाडी है। उसकी शक्ती पीठ के रिढ से आरंभ होती है । अगर इस शक्ती को सही ढंगसे जगाया जाये तो मनुष्य को संपूर्ण जगत का ज्ञान मिलता है । इसी ज्ञान को भारतीय भाषा मे ब्रम्हज्ञान कहते है । कुंडलिनी की जागृती के कारण मनुष्य का जीव एवं उसके आत्मा का तादाल होता है । एवं मनुष्य शास्त्र कह दृष्टीसे उनके ज्ञानमे परिपूर्ण केवल कुंडलिनी की मददसे होता है ।

कुंडलिनी एवं सर्प की हालत एक जैसी है । इसलिये हमारे पुरखोने सर्प को भी महत्व दिया है, और तत्संबधीत रुढी रिवाज को भी, अगर हमने साप को मारडाला या किसीसे मारने को कहा तो सापके मृत्यु का बोझ अपने को सहन करना होता है । यह पाप वंशवर्धन की प्रगती रोकता है। या उसमे अडचनों का निर्माण करता है । परिवारके पुरुष, बालको के संदर्भ मे साप मारने के दृष्टपरिणाम बडी तीव्रतासे देखे गये है । इस पापसे रिहाई के हेतु नागबली का विधिवत विधी करणे की धार्मिक मान्यता है ।

धरती में कही भी धन गाडकर या दबाकर रखा हो तो उस जगह कईयोंने साप देखा होगा और यहतो स्वाभाविक है । जिस व्यक्ती ने वह धन जमीन मे दबाया है उनका संबंध उनके दिलसे है । इसलिये उस व्यक्ती के मौत के बाद उस संबंधित व्यक्ती का आत्मा गाडे हुए धनके इर्द -गिर्द घुमता रहता है, और अन्त मे सर्प योनीमे जन्म लेता है ।

हम अगर अपने धर्म ग्रंथो के सं संदर्भ देखते है, तो सापों का महत्त्व हम वाकई मान जायेगें हमारी पृथ्वी विष्णूके सिरपर विश्राम कर रही है । इस सर्प का नाम वासूकी है शास्त्र की भाषामें सर्प याने वासुकी । यह वासुकी याने कुंडलिनी शक्ती के ऊपर पृथ्वी यह एक भारी चिज नही है, परंतु जिन भावो के कारण हम संसारसे सही मायनो में संपर्क रखते है । उसका एक जिवित प्रतिक है जब यह भाव, सच अभिलाषा शक्तिशाली होती है तब आत्मा सर्प योनी में प्रवेश करता है । या कुंडलीनी में प्रवेश करता है । ऐसा हम कह सकते है, इसकी अनुभूती कईयोंने की है । अगर नागबली का विधी श्रध्दासे पुरा किया जाये तो विधी करनेवाला सर्पहत्या के पाप से मुक्त हो जाता है और उसका आत्मा मोक्ष पा लेता है ।

श्री रामजी वनवास में लक्ष्मणजी के साथ रहे और लक्ष्मण निरंतर उनकी छाया जैसा रहा । लक्ष्मण को शेष का अवतार कहा जाता है । लक्ष्मण के बिना श्रीरामजी का जंगलो में रहना कितना अधुरा एवं सुरक्षाहिन होता ।

जब पिता वासुदेवजी भगवान श्रीकृष्ण को टोकरी में डालकर टोकरी सरपर रखकर उनके जन्मके बाद तुरंन्त मुसलधार बारीश में मथुरासे गोकुळ ले गये उस वक्त शेष नाग ने भगवान कृष्ण के सिरपर अपने फन का छत्र धरा था, और उनकी एवं पिताश्री वासुदेवजी की रक्षा की थी ।

वैसे ही भगवान श्रीकृष्णजीने यमुना नदी को उसका रंग कालीया सर्प को मारकर ही प्रदान किया था । जो सभी जानते ही है ।

भगवान श्री विष्णू जो सारे विश्वका बोझ अपने कंधोपर उठाते है । उनकी विश्राम शास्त्र भी शेषनाग ही तो है । यह शेषनाग उनकी पुरीतरह से रक्षा करता है । यह भी सभी जानते है ।

भगवान महादेवजी - शंभुजी देवो के देव जाने जाते है । मौक्ष प्रवेश उन्हीं अधिकार में मनुष्य को मिलता है ।

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