ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथा

पौराणिक कथा - त्रिशंकु राजाकी

बहोत पहले सुर्यवंशातर्गत इक्ष्वाकू कूल मे त्रिशंकु नाम का राजा था । उसके पिता का नाम पृथृ ऐसा था। उसे ऐसी इच्छा उत्पन्न हुई की वह सदेह स्वर्ग मे जाए इसलिये वह उसके कुल के कुलगुरू वसिष्ठ के पास जाकर उसने उन्हे बिनंती की की, स्वर्ग कामोयजे तू । जिसे स्वर्ग मिलना चाहिए ऐसी इच्छा है, उसने यज्ञ करना चाहिए अगर ऐसा है तो मुझे स्वर्ग जाने की इच्छा है, किंन्तु मेरी इच्छा मृत्यु के बाद स्वर्ग प्राप्ती ना हो के, इस भारी देह से (पंचभौतिक) स्वर्ग मे जाने की है । आप यज्ञ का आचार्यत्व करके वह यज्ञ मुझसे करवा लिजिए उसपर वसिष्ठ ऋषिने बताया की ''इस भारी देह से स्वर्ग जा नही सकते वहाँ के शरीर तेजोमय होते है । इसलिए तुम्हारी इच्छा पुरी होना संभव नही है । इसलिये मै आपसे यज्ञ नही करवा सकता''। तब राजा त्रिशंकुने वसिष्ठ ऋषि के पुत्र से पुछा किन्तुं वसिष्ठ के पुत्र ने भी नकार देने के बाद त्रिशंकु को गुस्सा आया तो वह बोले, ''मै दुसरा गुरू करके उससे यज्ञ करवा लुंगा'' । ऐसा बोलनेसे वसिष्ठ को भी, योग्य मार्गदर्शन करने के बाद भी ये क्यो नही सुन रहे है। ऐसे लगा और वे कोपीत हो गये । उन्होने त्रिशंकु राजा को शाप दिया की '' तु तेजोहीन हो जाएगा'' उस शाप से त्रिशंकु निस्तेज हो गया किन्तु उसने अपनी जिद्द नही छोडी । वह ऋषी विश्वामित्र के पास गया और अपनी इच्छा उन्हे बताकर उनसे आचार्यत्व की प्रार्थना करने के उनके संमती से यज्ञ को शुरूवात की किन्तु यज्ञीय हर्विभाग लेने के लिए भगवान नही आ रहे थे । तभी यज्ञ से काम नही हो रहा है ऐसा विश्वामित्र ने जानकर उन्होने ऐसा निश्चित किया की मैने आज तक तपश्चर्या की है, उस पुण्य के दान से उसे मे स्वर्ग भेजुंगा, क्योकी मैने उसे वचन दिया है और वह पुरा करना होगा। सोचकर त्रिशंकु के हाथ पर अपने सब पुण्य का उदक (पानी) छोडकर उसे विश्वमित्रने स्वर्ग मे भेजा । स्वर्ग के राजा इंद्र उसे स्वर्ग में नही ले रहे थे । त्रिशंकु राजा को स्वर्ग से निचे ढकेला गया ।

वह निचे सीर के बल गिरे । उन्होने विश्वमित्र की प्रार्थना की तब विश्वामित्र ने उन्हे आकाश मे अधांतरी स्थीर किया और इंद्र को बताया, 'तू इसको स्वर्ग मे लो, आप नही लोगे, तो मै अलग से स्वर्ग बनाऊ और उसमें इसे रखुंगा । तभी देवेंद्र एवं विश्वामित्र मे सोच विचार होने के बाद त्रिशंकु को नक्षत्रो मे जगह दि गयी ।

इसतरह त्रिश्ंकु के जीवात्माको योग्य गति नही मिली इसलिये उसका पुत्र जो हरिश्चंद्र है, उसमें विधी किया । ऐसा दालभ्य संहिता मे 'त्रिशंकु स्वर्ग कामेन हरिश्चंद्रेण वै कृत: ऐसा वर्णन किया है ।

भीष्माचार्य की कथा

एकबार भीष्माचार्य अपने दिवंगत पिता जो शंतनू थे, उनके लिए श्राध्द करते वक्त उसे पिंड देने के लिये जमीन पर दर्भमुष्टि डाली थी । तो निचे के जमीन से उनके पिता सुवर्ण युक्त हाथ उपर आया, वो हाथ देखकर भीष्माचार्य को शंका उत्पन्न हुई की, पिंडदान हाथ पर करें या इस दर्भ पर उसपर उन्होने ऐसा बताके उन्होने पितरो को बताकर हाथ के उपर पिंड ना देते दर्भ के उपरही पिंडप्रदान किया । यह देख के उपर आया हुआ हाथ अदृश्य हो गया शंतनूने भीष्म को बताया की, मैने आपके शास्त्रपर जो श्रध्दा है उसकी परीक्षा लेने के लिए यह हाथ उपर किया था, किन्तु शास्त्र में बताये गये अनुसार श्राध्दासहित जो पिंड दर्भ के उपर आपने प्रदान किया, उससे मुझे पूर्ण तृप्ती मिली है । ऐसा कथा का भाग महाभारत के अनुशासन पर्व मे है । (अध्याय ८४ श्लोक १४ से) इस तरह अनेक उदाहरण इसके विषय मे है । वह सब इतिहास देना संभव नही है ।

ज्ञानेश्वर महाराज की कथा

निवृत्तीनाथ ज्ञानेश्वर महाराज वगैरा संत जब भारत वर्ष की तिर्थ यात्रा करते घटप्रभा, मलप्रभा, ऋष्यूमुक पर्वत, किष्किधा इत्यादी तीर्थ क्षेत्र से घुमते घुमते कार्तिकस्वामी के सुप्रसिध्द ऐसे कुशावर्त तीर्थपर आये वहाँ शीख पंथ के नामक साधू से उनकी मुलाकात हुई । वे साधू पूर्ण सिध्द थे । उन्होने ज्ञानेश्वर सर्व संतोका सत्कार करके, अपने सिध्दी के सामर्थ्य से पंचपक्वान भोजन बनाया । तभी नामदेव बोले 'कार्तिकस्वामी का कुमार तीर्थपर अगर हम उनका प्रसाद ले रहे है ।

तो उन्हे समक्ष बुलाना योग्य होगा । तभी निवृत्ती नाथने उस साधू की तरु ऊगंली दिखाई यह बाम उन साधु के भी ध्यान में आयी वे बोले, ''मै कार्तिक स्वामी को बुलाने मे समर्थ नही क्योकी, परलोक गये हूए लोग वापीस नही आते उनके लिए किए गये श्राध्दादिक क्रियाएँ सब मिथ्या है । परंतु ज्ञानेश्वरजी पैठण मे ऐ ब्राम्हण को पितर खाने पर बुलाया ऐसा मैने सुना है । तभी अगर वही कार्तिकस्वामी को बुलाये तो मै ''श्राध्दादिक क्रिया के बारे मे मेरा मत बदलाऊंगा एवं श्राध्द करना चाहिए इस बात विश्वास रखुंगा । तभी ज्ञानेश्वर महाराज बोले की, ''श्राध्दादिक क्रिया योग्य है वह यथा बताए गये होने चाहिए क्योकी वासनात्मक देह सुक्ष्मावस्था मे बच जाते है । उसमे से उन्हे आगे ले जाने के लिए वेदोने श्राध्दादिक क्रियाएँ बताये है । वे योग्य नही यह कहना याने स्वंय को दृष्टी ना होने पर सूर्य नही ऐसा बोलना है । ये संत सिध्द है उनकी यह इच्छा की कार्तिक स्वामी भोजन के लिये यहॉ आये । इसलिये नामदेवजी आप कार्तिक स्वामीजी को यहॉ ले आए। तब नामदेव बोले, ''ज्ञानके इच्छा नुसार भक्ती को उन्होने प्रणाम किया और कार्तिक स्वामीजी को बुलवाने गये और थोडीही देर मे परलोक वासी रहनेवाले कार्तिक स्वामीजी को लेकर वापस आए । कार्तिकस्वामी के साथ सभी संत मंहतो ने बडे चाव से भोजन किया । रात में नामदेवजी का किर्तन हुआ । कार्तिकस्वामी श्राध्द संस्था के बारे मे गुरूनानक ये सिध्द पुरूष को भी परमादर लगा । इस में कुछ राज है, ऐसा उन्हे पक्का लगने लगा, उन्होने अपने ग्रंथ मे इस श्राध्द संस्था के बारे में बताकर वह करना चाहिए ऐसा मत प्रदर्शित किया । नानकजी के ग्रंथ में नामदेवजी के उनसे मिलने के इस वाकियां का वर्णन है ।

उपसंहार

वेदपुराण ग्रंथोमें मनुष्यपर आनेवाले संकट तथा रोगोंका निरसन विधीसहित बताए गये है । हम अगर सिर्फ इस प्रकृती (कुदरत) का उदाहरण का विचार करें तो उसकी शक्तीभी असीम है । चंद्रोदय होने के पश्चात समुंदर का पानी उपर खिचता है और समुद्र को ज्वार (भरती) आता है । उसी प्रकार उपर फेंका गया कोई भी पदार्थ आकर्षण शक्ती के कारण निचे आ गिरता है । इस प्रकारके कार्य मानव की बुध्दी को समझ आते है । परंतु कुदरत के कई कार्य ऐसे है की मानवी बुध्दी से परे है । जो की सृष्टी के यह कार्य हमं सुलझा नहीं पाते इसका मतलब वह असंभव है यह कहना बुध्दीवादी के स्वभावानुसार नहीं होगा । यही कार्य जो सामान्य मनुष्य की बुध्दी के समझ के बाहर होते है तो उन्हे खोजने के काम वेद-पुराण, शास्त्रे, नाग-नारायण विधी प्रकाशित करके की है ।

आज हजारो लोग नारायण-नागबली की पुजा अपत्य प्राप्ती तथा दुसरे कामों के लिए करते है । यह पुजा एक सकाम श्राध्द है । नाग और नारायण को श्रध्दा सहित विधीयुक्त अन्नाहार, द्र्व्य, तील, दर्भादि अर्पण करना ही नारायण-नागबली कहलाता है । यह विधी शास्त्र और परंपरानुसार त्र्यंबकेश्वरमें ही किया जाता है । यह श्राध्द पुत्रप्राप्ती, जिवित, संतती, शारिरीक पीडा, मृतात्मा की कुदृष्टी, पिशाच्च पिडा तथा जीवन अच्छा होने के लिए किया जाता है । वैज्ञानिक दृष्टीकोन के अनुसार संतती न होने का कारण पती या पत्नीमें शारिरीक दोष होता है । परंतु अगर दोनों में कोई दोष न हो और फिरभी संतती प्राप्ती न हो तो उसे क्या कहेंगे ? इसके पिछे कोई अदृष्य कारण हो सकता है । अदृष्य कारण समझना ही योग्य है क्यों के विधी और परंपरा तय करते वक्त लोगो का अनुभव ही प्रमाण माना गया है और उसी से विधीविधान की उपयुक्तता तय की जाती है । परंतु इस विचार पध्दती में भी सुक्ष्म दोष रह जाता है । क्यों की व्यवहारिक दृष्टी में कभीकभी एखाद मनुष्य गणित का उत्तर योग्य दे सकता है परंतु उत्तर की पध्दती मात्र गलत हो सकती है । उसी प्रकार दुसरे जगहो पर की जाने वाली पुजा की पध्दती के बारे में भी कहा जा सकता है । मतलब विधान करने के बाद संतती प्राप्ती हो जाये तो अदृष्य कारण परंपरा सौ ट्क्का गलत है यह कहना भी तर्कसंगत होगा नही । दुसरी तरह विचार किया जाये तो गलत पध्द्ती से गणित का उत्तर बराबर आ जाये भी तो हरबार ऐसा न होते हुए उत्तर गलत आने की संभावनाही अधिक है । इसी कारण समान अनुभव आनेपर कारण परंपरायुक्त है ऐसा कहना गलत न होगा । उपर दिये उदाहरणो से ध्यान रखना आवश्यक है की उपर के विधान अनुभवसिध्द और पूर्व परंपरानुरुप ही है । प्रयत्नवाद और बुध्दीवाद छोडके केवल परंपरा का विचार करना भी अयोग्य है । मनुष्य को दोनो का विचार करना आवश्यक है । सिर्फ एक की कारण का विचार करना मतलब रोग से मुक्तता के लिए केवल वैद्य की दवां के भरोसे ही रोगमुक्त होने का आग्रह करने जैसा है । इसीप्रमाण सारासार विचार करके ही नारायण नागबली का वेदप्रणीत विधान आपकी वंशवृध्दी, जीवन में आनेवाली कठिनाईयॉं दूर करने के लिए भाविक और श्रध्दा रखनेवाले शास्त्रकारोंने अत्यंत सुक्ष्म विचार करके मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए बताए है ।

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