त्रिपिंडी श्राध्द

त्रिपिंडी श्राध्द याने काम्य श्राध्द । जिस मृत व्यक्तीका लगातार तीन वर्ष विधिवत श्राध्द नही किया जाता ऐसे व्यक्ति के आत्मा का रूप प्रेतयोनी में बदल जाता है । अमावस यही पित्तरों का दिन होता है, इसलिए इस दिन श्राध्द किये जाते है । परंतु नवरात्री एवं भादो महिने के कृष्ण पक्ष मे मृत्यु दिनपर त्रिपिंडी श्राध्द नही करते.

त्रिपिंडी श्राध्द कहा और कब करोगे ? त्रिपिंडी श्राध्द का महत्त्व एवं श्रध्दा
त्रिपिंडी श्राध्द के नैतिक एवं कानुनी अधिकार त्रिपिंडी श्राध्द करने के फल

त्रिपिंडी श्राध्द कहा और कब करोगे ?

tripindi-shraddhaश्रावण, कार्तिक, पौष, माघ, फाल्गुन एवं वैशाख माह के सफेद एवं काले पक्षमें पंचमी, अष्टमी, एकादस, तेरस, चौदस एवं अमावस आदि दिनों में परंपरासे चले आये शास्त्र के अनुसार त्रिपिंडी श्राध्द कर सकते है । सूर्य अक्सर कन्या या तुला राशी में सोलह सिंतबर से पदरह नवम्बर तक होता है । इस निर्देशित कालखंड त्रिपिंडी श्राध्द के लिये अति लाभदयक होता है । अगर समस्या मुश्किल एवं असहनिय हो तो 'गोदाविवेक दर्श' इस किताब का संदर्भ लेने में कोई हर्ज नही है । यह किताब उत्तम मार्गदर्शन करती है ।

त्रिपिंडी श्राध्द केवल और केवल त्र्यंबकेश्वर में ही करे ।

त्रिपिंडी श्राध्द साल भर में किसी दिन केवल त्र्यंबकेश्वर में ही शास्त्र के अनुसार कर सकते है । ऐसी हिंन्दू धर्म के परंपरा के शास्त्र की मान्यता है ।
कवि कालिदास के महान तथा श्रेष्ठ काव्यमें 'रघुवंश' में त्र्यंबकेश्वर को 'महेश्वर' कहा है । इस काव्य में उन्होंने महेश्वरसे प्रार्थना की है की प्रेतयोनी में जुडे हुए आत्माओं के कुकर्मो को खत्म करके उन्हे मुक्ति प्रदान करे ।
त्र्यंबकेश्वर तिर्थ में 'कुशावर्त' नाम का एक तीर्थ याने सरोवर है । इस सरोवर के पास एक बहुत बडा अश्वत्य (पिपल का पेड) का वृक्ष है । इस पेड के समीप 'करपंदीकेश्वर' का एक मंदिर है।
त्रिपिंडी श्राध्द का विधिवत विधि अगर इस मंदिर के पास किया जाये तो बहूत लाभकारी होता है, ऐसा कहा जाता है ।
त्र्यंबकेश्वर से छ: (६) किलोमीटर दुरीपर एक स्थान है, उसे पिशाच्च्‍ा विमोचन 'तिर्थ' कहते है । अगर त्रिपिंडी श्राध्द श्रध्दासे इस जगह विधिवत किया जाये तो पिशाच्च के कारण होनेवाली सभी तकलीफे खत्म हो जाती है । ऐसी धार्मिक मान्यता है । और इस बात की अनुभूति कइयोंने अनुभूत की है।
अगर तिर्थ श्राध्द एवं त्रिपिंडी श्राध्द शास्त्र के अनुसार करना हो तो पहले त्रिपिंडी श्राध्द का विधी करते है । और बाद मे तिर्थ श्राध्द का प्रेत योनी की तरह की होती है । उनके नाम अनुक्रम ये तमोगुणी, रजोगुणी एवं सत्वगुणी है । मनुष्य के गुण एवं स्वभाव के अनुसार उनका रूप उस योनी में बदलता है । जैसे की तमोगुणी प्रेत योनी, रजोगुणी योनी एवं सत्वगुणी योनी मृत्यु के बाद प्रेतयोनी की पिशाच्चोसे मुक्ति करने की हेतु से त्रिपिंडी श्राध्द किया जाता है ।
त्रिपिंडी श्राध्द का धार्मिक विधिवत विधी करने से पहले शरीर की शुध्दता के हेतु गंगा मिलन याने गंगास्नान करना होता है । उसके बाद प्रायश्चित का विधी करना होता है । इसके लिए क्षौर याने मुंडन करने की आवश्यकता नही है । परंतु अक्सर इस विधि पर मुंडन करने की प्रथा रुढ हुई है । त्रिपिंडी श्राध्द करते समय ब्रम्हा, विष्णु, एवं महेश देंवताओ की प्रतिमा बनाकर उन्हे दिलसे पुजा जाने की रिती है । तीन ब्राम्हणों को मंत्रोच्चारण से इन इन देवताओं को प्रसन्न करने का अधिकार दिया गया है । अगर तकलीफ देनेवाली प्रेतयोनी का नाम मालूम न हो तो 'अनरिष्ट गोत्र' इस शब्द का प्रयोग करते है । यह श्राध्द किसी एक विशेष प्रेतयोनी को या आत्मा को संबोधित कर के ही किया जाता है । इस विधी में अलसी (जवस) के आटेका पिंड, तिला एवं चावलोंको पकाकर उसके पिंड बनाये जाते है । इन पिंडो में चिनी एवं घी भी डालते है । अलसी के आटे का पिंड तमोगुणी आत्मा या प्रेतयोनी को अर्पण करते है । पुजा होने के बाद ये तिनो पिंड, महालिंग का भोग आदि देवताओं के सामने रखते है । यह रीत अपने परीवार को तंग करनेवाले पिशाच्चो को खुश रखने के हेतु एवं उनके कुकर्मी की तकलीफ अपने परिवार के किसी भी सदस्य को न हो इस कारण की जाती है । एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी है की उस प्रेतात्मा को चिरशांती मिले यह भी कारण होता है । सोना, चांदी, तांबा, चावल, अलसी, काले तील, उडद, खडाऊ या गाय दान में देते है या गायकी किंमत का धन दान करते है । इसके बाद ब्राम्हण भोजन में शादीशुदा महिलांओको भी बुलाआ जाता है । इसतरह त्रिपिंडी श्राध्द का विधिवत धर्म के अनुसार विधि केवल त्र्यंबकेयवर में सालभर में किसी भी दिन कर सकते है । इसे हमारे धर्म शास्त्र की मान्यता है ।

त्रिपिंडी श्राध्द के नैतिक एवं कानुनी अधिकार

पति एवं पत्नि दोनो एकसाथ मिलकर इस विधि को कर सकते है ।
विधुर पुरुष (जिसके पत्नी का देहांत हुआ हो) उसे भी यह विधी करने का अधिकार है ।
जिस पुरुष का विवाह नही हुआ वह भी यह विधी कर सकता है ।
हिन्दू स्त्री विवाह के बाद दुसरे परिवार में जाती है इसलिए उसे उसके माता-पिता के लिए त्रिपिंडी या श्राध्द करने का अधिकार नही है । परंतु असके पति के रिश्ते मे मृत व्यक्ति के लिये त्रिपिंडी एवं श्राध्द करने का अधिकार है । इस विधि के हेतु उसे कोरा सफेद वस्त्र परिधान करना होता है ।

त्रिपिंडी श्राध्द का महत्त्व एवं श्रध्दा (विश्वास)

त्रिपिंडी श्राध्द विधी याने सत्यनारायण पुजा नही यह हर एक ने ध्यान में रखना चाहिए है । इसलिये यह विधी निष्णांत मार्गदर्शन में ही संपूर्ण श्रध्दा के साथ विश्वास से परंपराओं के शास्त्रशुध्द तरीकेसे करना चाहिए । इस बारे में हमारे धर्मग्रंथ में एक मशहुर कथा है । भीष्माचार्य अपने पिताश्री शंतनुजी का श्राध्द विधिनुसार कर रहे थे । पिडंदान करने के हेतुसे जमीनपर चटाई फैलाई हुई थी । उसी वक्त एक सोन का आभूषण पहना हुआ हाथ पिंड लेने के हेतुसे जमीनसे उपर आया । वह हाथ देखकर भीष्माचार्य भी कुछ पलो के लिए चकरा गये की पिंड कहा रख जाये और फिर तुरंत उन्हे याद आया की परंपरागत शास्त्र के अनुसार पिंडदान दर्भपर ही रखकर किया जाता है और उन्होने वैसा ही किया । अकस्मात शंतनुजी का हाथ भी गुप्त हो गया । भीष्माचार्य ने पिताश्री के वचन सुने, उन्होने कहा था भीष्माचार्य में तुम्हारे परंपरा शास्त्र की परिक्षा ले रहा था । आपने वाकई सही जगहपर याने दर्भपर पिंडदान किया है । इसका कारण आपका पारंपारिक ज्ञानपर विश्वास एवं श्रध्दा है, और वह पिंड आपने मेरा हाथ है ऐ जानकर भी नही दिया इसलिये में तेरे इस ज्ञान एवं श्रध्दा - विश्वास पर बहूत खुश हु ।

इसिलिये हमें आपसे कहना है, की यह धार्मिक विधि आप श्रध्दा, विश्वास ,एवं पारंपारिक शास्त्र के अनुसार कुशल मार्गदर्शक के निर्देश में ही संपन्न करे ।

त्रिपिंडी श्राध्द का फल या लाभ

कुछ लोग अपने जिवित माता - पिता एवं सगे संबधियों को बहुत तंग करते है, और उनके मृत्यु के बाद औपचारिकता के प्रदर्शन करने हेतु या अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढाने के हेतु से 'गंगा प्रसादी' का विधी खुब बडे तौर पर आयोजित करते है । गंगा प्रसादी का विधी याने मृत व्यक्ति के सभी क्रिया गंगा नदी पर करना और गंगाजल घर लाकर मयत मृत व्यक्ति के सन्मान के लिए महाभोजन का कार्यक्रम करना, हजारों की तादाद में देना, ऐसे समारोह हम अपने इर्द-गर्द व्यक्ति के मृत्यु के बाद ही किये जाते देखते है । मशहुरी के लिए या सामाजिक प्रतिष्ठा को ऊची करने के लिए ही किये जाते है । परंतु इस के बावजुद भी अतृप्त प्रेतात्मा के कारण इन लोगोकों या इनके परिवार के सदस्यों को कई समस्याओं का सामना करना पडता है । अगर पारंपारिक शास्त्र पध्दती से विधिवत श्राध्द न हो भूत प्रेतो की परेशानी सहने के बिना उनके पास कोई चारा नही होता । डॉक्टरी इलाज भी उनकी तकलीफो को कम नही कर सकते ।

परिवार में हमेशा झगडे, फसाद का माहोल बना रहना, बेटे-बेटियों का समय पर विवाह न होना, व्यापार में कर्ज का बोझ बढते जाना, मृत व्यक्ति का सपने में लगातार आते रहना, जादू टोने के कारण असहनिय पिडा होना । ऐसी कोई तकलिफों से छुटकारा पाने के हेतु त्रिपिंडी श्राध्द का विधिनुसार विधी श्राध्द 'चिंतामणी' किताबमें बतायी हुई है, इस किताब में ऊपर उल्लेख कियी गयी तकलिफों के लिए सही उपायों की क्षमता है, और अपने तकलिफों से मुक्त होने की ताकद भी । हमारे यहाँ ऐसी कईयों की मिसाल है जिन्होनें त्रिपिंडी श्राध्द विधिवत किया है और उनकी समस्याएँ, तकलिफे चुटकी से सुलझायी गयी है । या उनको तकलिफोंसे मुक्ति हो गयी है ।

अगर नारायणबली का विधी 'पुतलविधी' के साथ किया हो तो त्रिपिंडी दुबारा अलग करने की जरुरत नही होती । संन्यासीयो को श्राध्द विधी करना आवश्यक नही होता क्योंकी उन्हे देवता समान माना जाता है, परंतु गृहस्थियों के लिए जिन्हे परिवार, बाल, बच्चे है, मृत माता - पिता के लिए या पूर्व सुरियो के लिए या पूर्व सुरियों के लिये यह विधी अति आवश्यक माना गया है।

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