आखाडा

सिंहस्थ कुंभपर्व शाहिस्नान के आखाडा

श्री क्षेत्र त्र्यंबकेश्वर यहा गोदावरी तिर्थराज कुशावर्त का प्रसिध्द तिर्थ आहे. यहा से गोदावरीका बहाव बहता है। पूर्वकाल में यहा गौतम ॠषी का आश्रम था। जगदगुरु शंकराचार्या का भी यहा स्थान है। महाकुंभपर्व के वक्त शाहीस्नान के लिए आनेवाले दसनाम संन्याशी, साधु और महंतो के आखाडे है। उनका परिचय तिर्थ, आश्रम, सरस्वती, भारती, गिरी, पुरी, वन, पर्वत और सागर इनसे होता था। एक जमाने में यह सब संघटित थे परंतु मतभेद के कारण इन आखाडों में बटवारे हुए| अभी आखाडे इस प्रकार है।

श्री निरंजनी आखाडा

यह आखाडा संवत ९६० सन ८२६ सांमवार रोजी मांडवी (कच्छ) यहा स्थापन हुआ. इनकी इष्ट दैवत ''कार्तिकस्वामी'' है। इनमें नियमबध्द नागे(दिगंबर), साधु, मंहत व महामंडलेश्वर इनकी संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाए प्रयाग (अलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर तथा ओकांरेश्वर, उदयपुर व ज्वालामुखी यहा है। उनके स्नान का समय पहली भोर होते ही होता है।

श्री जुनादत्त (भैरव) आखाडा

यह आखाडा संवत १२०२ सन १०६९ में कार्तिक शुध्द दशमीस कर्णप्रयाग यहा स्थापन हुआ। इनकी इष्ट दैवत ''श्री. रुद्रावतार दत्तात्रय'' है। इनमें नियमबध्द नागे(दिगंबर), साधु, मंहत व महामंडलेश्वर इनकी संख्या ज्यादा है। तथा इनमें अवधुतानिया भी होते है। उनकी शाखाए प्रयाग (अलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर, काशी व ओकांरेश्वर यहा है। उनके स्नान का समय पहली भोर होते ही होता है।

श्री महानिर्वाणी आखाडा

यह आखाडा संवत ८०५ सन ६७१ मध्ये मार्गशीर्ष शुध्द दशमीस झारखंड वैजनाथ धाम (बिहार) प्रांत यहा स्थापन हुआ। इनकी इष्ट दैवत ''श्री कपिल महामुनी'' है। इनमें नियमबध्द नागे(दिगंबर), साधु, मंहत व महामंडलेश्वर इनकी संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाए प्रयाग (अलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर, ओंकारेश्वर व कनखन यहा है। उनके स्नान का समय पहली भोर होते ही होता है।

श्री अटल आखाडा

यह आखाडा संवत ७०३ सन ५६९ मध्ये मार्गशीर्ष शुध्द चतुर्थीस गोंडवन यहा स्थापन हुआ। इनकी इष्ट दैवत ''श्री गजानन'' (गणपती) है। इनमें नियमबध्द नागे(दिगंबर), साधु, मंहत व महामंडलेश्वर इनकी संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाए प्रयाग (अलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर, काशी आजर व बडोदा यहा है। उनके स्नान का समय पहली भोर होते ही होता है।

श्री आवाहन आखाडा

यह आखाडा संवत ६०३ सन ४६९ मध्ये ज्येष्ठ नवमीस स्थापन हुआ। इनकी इष्ट दैवत ''श्री. दत्तात्रेय '' व ''श्री गजानन'' है। यह आखाडा पुराना दत्त आखाडा के साथ ही रहता है। इनका केंद्रस्थान ''काशी'' है। उनकी शाखाए प्रयाग (अलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर यहा है। उनके स्नान का समय पहली भोर होते ही होता है।

श्री आनंद आखाडा

यह आखाडा संवत ९१२ सन ७७८ मध्ये ज्येष्ठ स्थापन हुआ। इनकी इष्ट दैवत ''श्री. अग्नि '' व ''श्री सूर्यनारायण'' है। यह आखाडा निरंजनी आखा्डा के साथ ही रहता है। इनमें नियमबध्द नागे, साधु मंहत व महामंडलेश्वर इनकी संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाए प्रयाग (अलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर, यहा है। उनके स्नान का समय पहली भोर होते ही होता है।

श्री पंच अग्नि आखाडा

यह आखाडा सन १०५८ मध्ये आषाढ शुध्द एकादशीस स्थापन हुआ। इनकी इष्ट दैवत ''गायत्री'' है। इनका प्रधान केंद्र ''काशी'' है। इनमें चारही पीठों के शंकराचार्य, ब्रम्हचारी, साधु व महामंडलेश्चर इनकी संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाए प्रयाग (अलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर, यहा है। उनके स्नान का समय पहली भोर होते ही होता है।

श्री नागपंथी गोरक्षनाथ आखाडा

यह आखाडा संवत ९०० सन ८६६ मध्ये त्र्यंबकेश्वरी अहिल्या - गोदावरी संगमपर स्थापन हुआ। इनके संस्थापक पीर शिवनाथजी है उनका मुख्य दैवत ''गोरक्षनाथ'' है और इनमें बारा पंथ है। यह सांप्रदाय योगिनी कौल नामसे प्रसिध्द इनकी त्र्यंबंकेश्वर शाखा ''त्र्यंबकं मठिका'' नामसे प्रसिध्द है। इसके अलावा राजामठकद्री (म्हैसुर) यहा भी शाखा है। इनका त्र्यंबकेश्वर में एक स्नान होता है और वो ''नागपंचमी'' के दिन होता है।

श्री वैष्णव आखाडा

यह बालानंद आखाडा संवत १७२९ सन १५९५ मध्ये दारागंज येथे ''श्री मध्यमुरारी'' स्थापन हुआ। समय के साथ इनमें निर्मोही, निर्वाणी, खाकी आदी तीन सांप्रदाय स्थापन हुए। इनका शाही स्नान दशनामी सांधु के स्नान के बाद होता है। इनका आखाडा त्र्यंबकेश्वर में मारूती मंदिर के पास था। सन १८४८ तक शाहीस्नान त्र्यंबकेश्वर में ही हुआ करता था परंतु सन १८४८ में ''शैव'' व ''वैष्णव'' साधुंओमें पहले स्नान कौन करे? इस मुद्दे पर झगडे हुए। वह इतना बढा की १८,००० साधुओ की कत्तल की गयी। श्रीमंत पेशवाजीने यह झगडा मिटाया। उस समय उन्होंने त्र्यंबकेश्वर के नजदीक 'चक्रतिर्थापर' स्नान किया। १९३२ से वह नाशिक में स्नान करने लगे। आज भी यह स्नान नाशिक में ही होता है। (उस वक्त से नाशिक कुंभमेला शुरु हुआ परंतु सच जानने के बाद कुंभमेला स्थान आप सुज्ञ वाचक समझ सकते है।)

श्री उदासिन पंचायती बडा आखाडा

यह आखाडा संवत १८४४ सन १९१० में स्थापन हुआ। इस सांप्रदाय के संस्थापक श्री चंद्रआचार्य उदासिन है। उनमें सांप्रदायिक भेद है। इनमें उदासिन साधु, मंहत व महामंडलेश्वर इनकी संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाए शाखा प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर, भदैनी, कनखन, साहेबगंज मुलतान, नेपाळ व मद्रास (चेन्नई) यहा है। इनका शाही स्नान सूर्योदय के पश्चात होता है।

श्री उदासिन नया आखाडा

यह आखाडा संवत १९०२ सन १७१० में स्थापन हुआ। इसे बडा उदासिन आखाडा की कुछ सांधुओने विभक्त होकर स्थापन किया। इनके प्रर्वतक ''मंहत सुधीरदासजी'' थे। इनमें नया उदासिन आखाडयाचे सांप्रदायी सांधु, मंहत, व महामंडलेश्वर इनकी संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाए प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर, यहा है। इनका शाही स्नान सूर्योदय के पश्चात होता है।

श्री निर्मल पंचायती आखाडा

यह आखाडा संवत १९१८ सन १७८४ में स्थापन हुआ। १७८४ में हरिद्वार कुंभमेला के समय एक बडी सभा मे विचार विनिमय करके ''श्री दुरगाहसिंह महाराज'' इसकीस्थापना की। इनके इष्टदेव ''श्री गुरूनानक ग्रंथसाहिब'' है। इनमें सांप्रदायी साधु, मंहत व महामंडलेश्वर इनकी संख्या बहुत है। उनकी शाखाए प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर, यहा है। इनका शाही स्नान उदासिन आखाडा के शाही स्नान के बाद सबसे अंत में होता है।

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