गंगा संतोको पसंद है | वैचारिक लेख

संत जहौं जाते है, तप करते है । उन पवित्र जगह को तीर्थ माना जाता है । चंदन की तरह अपने आप को कम करना (घीसना) तप है । तपश्चर्यासे भाग्य बदले जा सकते है । संत तुलसीदासजीकी तपश्चर्यासे प्रसन्न होकर रघुवीरने उन्हे तिलक लगाया । तपश्चर्या के कारण ही गौतम ऋषी के भाग्य मे लिखा गोहत्या का पाप धुल गया । गौतम ऋषी की इस तपस्या के कारण ही कुशावर्त तीर्थ बन गया । कुशावर्त के जल की हर जलबिंदू में अनंत पुण्य कर्म है । यहा गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधू, कावेरी इन सप्तनदीयोंका संगम हुआ है ।
उपरी विवेचनका श्लोक है

प्रभावाद् - भुताद् - भुमे सलिलस्यच तेजस: ।
परिग्रहामुन्नीनां च तीर्थाना तीर्थता मता ।।

तीर्थ, पर्व, पर्वणी तथा मंगल स्नान पवित्र चौक है । नदी विराट पुरुष की नाडी समान है । इन्ही नाडीयोंसे पुण्य जल बहता है । यह पुण्यजल समानेवाली गोदावरी नदी ब्रम्हगिरीसे प्रकट हुई । ब्रम्हगिरी के छाया में बसा क्षेत्र त्र्यंबकेश्वर है । सत्ययुग में गोदावरी कुशावर्त में प्रकट हुई इसीलिये कुशावर्त तीर्थ का महत्त्व अधिक है ।

।। षद्कोणतीर्थराजकम् ।।

अनंतकालसे ब्रम्हाजी सारे विश्व का पाप पिये जा रहे है । गंगा, यमुना, सरस्वती, इन तीनो के संगम से बह रहा कुशावर्त का जल ब्रम्हदेव है । सिंहस्थ के दरम्यान इस जल मे स्नान अधिकतम पुण्य माना गया है। भगवान बृहस्पती जों की देवोकें पुरोहित है, गुरू है, सिंहस्थ के कालखंड दरम्यान सिंह राशी में प्रवेश करते है । तारे चंद्र, ग्रह तथा सूर्य देव इन्का स्वागत करते है । जब चंद्र और सूर्य एकरूप होते है उसी दिन को अमावस की पर्वणी कहते है । सारे देव इस दरम्यान त्र्यंबकेश्वर में उपस्थित होते है ऐसा माना जाता है ।

सिंह राशी का स्वामी सूर्य, मन का स्वामी चंद्र है । तथा ज्ञानदेवता बृहस्पती इस दरम्यान एकही राशीमें आते है । राशी अर्थ है समूह, टोली यहा समूह अपेक्षित है । मेंढीका ना सिंह का । इस सिंह राशी के पास सूर्यचंद्र आने से 'पर्वणी' होती है । रवि तथा चंद्र को गुरू का मित्र माना गया है । बृहस्पती, सूर्य तथा चंद्र सिंह राशीको सिंह जैसे बल तथा शक्ती प्रदान करते है । वह है कुशावर्त तीर्थ । कुशावर्त तीर्थ परही गौतम ऋषी को गोहत्या पापसे पूर्णविराम मिला था ।

ऐसी पावन जगह पर ही निवृत्तीनाथ महाराज को अपने गुरू गहिनीनाथ का दर्शन हुबा था । गहिनीनाथ, निवृत्तीनाथ तथा ज्ञानेश्वर महाराज की कर्म-भक्ति-ज्ञान की सागर मे डुबकीया लगाकर संत-मंहत सुखी भये ।

भागीरथी और गोदावरी तम्वत: एकही ।
माहेश्वर जटास्था या आपो दैव्यो महामते ।
तासांतु द्विविधो भेद: आहर्तु: पदकारणात् ।।

धूर्जटीके जटाओ से दो जलप्रवाह इस धरती पर उतरे है । महर्षि गौतम ऋषीने कृतयुग मे एक प्रवाह लाया तथा दुजा भगीरथने त्रेतायुग मे धरती पर लाया ।
ब्रम्हवर्चसाचा आल्हादक चंद्र गौतम ।

भगीरथने तप किया और जान्हवीका प्रवाह पृथ्वीपर आया । ब्रम्हतप का शांत व संथ शीतल प्रवाह गौतम ऋषी का त्रेतायुग मे भागीरथी प्रकट हुई और सत्ययुग मे गोदावरी उनकी वृध्द बहन गोदा त्र्यंबकेश्वर के ब्रम्हगिरीसे प्रकट हुई और छोटी बहन भागीरथी हिमालय की गोद से जन्मी । दोनो ही नदीयों के मुख्य प्रवाह एक है, परंतु वसुंधरा को लाने वाले तपस्वी दो थे - गौतम और भगीरथ । इसीलिए कहा जाता है 'ब्रम्हद्रवरुपा गोदावरी धर्मद्रवरुपा भागीरथी''।

जाप-ताप तपश्चर्यासे भाग्य बदले जा सकते है - संत तुलसीदासजी


गोदा महान (बडी) या गंगा ?

यह प्रश्न का उत्तर तो सिर्फ भगवान शिवही दे सकते है । दोन्होही अपने पती के उध्दार के लिए धरतीपर उतरी है । गंगा उम्र में बडी इसीलिये गोदा कहलाती है । यह गोदा शंकरजी के जटाओं से निकलकर दत्तवृक्ष औंदुबर के मुलियों तक पहुंच गयी और गोमुख से बाहर निकली । औदुंबर, वड तथा पिपल ब्राम्हण वृक्ष कहलाते है । गाय वेदमाता है और गंगा विश्वमाता है। इस धरतीपर पापमुक्त कोई नही है इसकारण विश्वउध्दार के लिए त्रेतायुग मे गोदाने गंगा का नाम धारण किया । दोनों के भक्तिभाव एक परंतु प्रवाह अलग है । कुंभ राशी मे जब गुरू का प्रवेश होता है तब गोदावरी गंगा से मिलने प्रयाग प्रस्थान करती है । सिंह राशी मे गुरु आता है । सभी तीर्थ, सरिता और देवता सिंहस्थ में गोदा स्नान करके त्र्यंबकराज की पूजा करती है । कहते है प्रेयसी पार्वती को बहला फुसलाकर गंगा को शिवजी के मस्तिष्क पर स्थानापन हो गयी । उसी गंगा को शिवजी ने विश्वउध्दार के लिए धरतीपर भेज दिया । गोदावरी ब्रम्हगिरी पर्वत की विशाल नदी है । तो वैतरणा झरना है । यह वैतरणा नदी मुंबई नगरीकी प्यास बुझाते हुये अलकनंदा नदी की तरह गंगा को मिलती है । गायत्री, गोमाता, व गीता यह गंगा के ही रुप है । इसी गंगाने निवृत्तीनाथ तथा ज्ञानेश्वरजी का उध्दार किया था । पंडित जगन्नाथ जी का भी उध्दार किया और उनकी कविता को परिसस्पर्श हुआ । दोनों नदीया एक दुसरे से मिलकर अनोखे रस मे डूब गयी । इसीकारण जगन्नाथने अलग गोदालहरी लिखी नही । गोदावरी के निकट भगवान त्र्यंबकराज है, इसीकारण साधू, संत-महंत गंगा मे स्नान को धन्यता मानते है ।

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